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Friday, September 28, 2012

कभी कभी मेरे दिल मैं ख्याल आता है

यह रंज-ओ-ग़म कि सियाही जो दिल पे छाई हैं
तेरी नज़र कि शुआओं मैं खो भी सकती थी।

मगर यह हो न सका और अब ये आलम हैं
कि तू नहीं, तेरा ग़म तेरी जुस्तजू भी नहीं।

गुज़र रही हैं कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे,
इससे किसी के सहारे कि आरझु भी नहीं.

न कोई राह, न मंजिल, न रौशनी का सुराग
भटक रहीं है अंधेरों मैं ज़िंदगी मेरी.

इन्ही अंधेरों मैं रह जाऊँगा कभी खो कर
मैं जानता हूँ मेरी हम-नफस, मगर यूंही

कभी कभी मेरे दिल मैं ख्याल आता है.

Tuesday, September 18, 2012

ममता ने यू पी ऐ का सिलेंडर उन्ही के सर पर फोड़ा


जी हाँ आप पतले नहीं हो सकते




बिलकुल नहीं!
सवाल ही पैदा नहीं होता जनाब।
मैं कह रहा हूँ ना, इसे मेरी भविष्यवाणी ही समझ लीजिये।
अब क्या लिख कर दूं?
की आप पतले नहीं हो सकते।

इससे पहले आप कुछ भी कहें, मैं कुछ तर्क वितर्क की बात कहना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ की आप यह जानने  को उत्सुक हैं की आप पतले क्यूँ नहीं हो सकते, तो सुनिए:

कारण नंबर 1 - आप बहुत ही बड़े चटोरे हैं 
 
 

चटोरापन क्या होता है, यह जानने के लिए पढ़िए मेरा पुराना लेख ( हम सब चटोरे हैं )

खैर इसमें कोई दो राय नहीं की जबतक आपसे आपका चटोरापन नहीं छूटेगा, यह कमर पेटी ( यानि  बेल्ट) और कमर में कशमकश यूँही चलती रहेगी। फिर चाहे आप जितना मर्ज़ी दंड पेल कर लें।

पर आप भी क्या करें, बीवी इतना अच्छा खाना जो बनाती  है, अब उसको तो ना नहीं बोल सकते, क्यूँ ?

जब परांठे परोसे जाएंगे तो मक्खन का उसपर तैरना तो मानो शगुन की निशानी हो चुकी है।

पूरियां अगर देसी घी में नहीं  बने तो समाज में आपकी नाक कट जाएगी। चांदनी चौक जाएं और खस्ता कचोरी नहीं खायी, तो आपके लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली स्थिति हो जाती है।

अगर आपका बस चले तो आप मेगी नूडल को राष्ट्रीय खाना घोषित करवाने के लिए जंतर मंतर पे धरने के लिए बैठ जाएं और अपना अनशन भी मेगी नूडल से ही तोडें।

क्या आपके जीवन में भी ऊपर लिखित कोई भी घटना घटित होती रहती है? अगर हाँ, तो आप पतले नहीं हो सकते।


कारण नंबर 2 - आप महा आलसी हैं



वैसे कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है, की कुम्भकरण से तेरा ज़रूर कुछ नाता है।

काश आज कुम्भकरण जिंदा होता, तो आपको देख शर्म के मारे पानी पानी हो जाता। बहरहाल, क्या आपके पास घडी है? बिलकुल होगी, पर क्या इसका प्रयोग कभी समय देखने के लिए किया है?

वोह छोडिये, पिछली बार अलार्म बजने पर बिना मुह बनाये कब उठे थे? 

सोचने वाली बात तो यह है की वक़्त के साथ समय की कीमत कम होती रही और घड़ियों की कीमत बढती रही। पर इसका आप जैसे आलसी महानुभावों पर कोई असर नहीं हुआ। आप तब भी आलसी थे, अब भी आलसी हैं।

चलिए एक बात तो बताइए, कितने साल पहले आप बाज़ार अपने नाज़ुक क़दमों को तकलीफ देकर गए थे, न की गाडी का पेट्रोल धूं धूं कर ? व्यायाम तो शायद हिटलर की नानी ने बनाया था, यही सोचते हैं न आप?


कारण नम्बर 3 - अनुशासन और आपका छतीस का आंकड़ा है



आपकी स्थिति को देखा जाये तो आपका और अनुशासन का रिश्ता भारत पाक रिश्ते से जादा बेहतर नहीं है। हर साल नववर्ष पर रेसोलुशन मुर्गा आपको जगाने की कोशिश में लगा रहता है पर उसकी कुकडूं कूँ एक दो दिन से जादा आपके कानों को नहीं भेद पाती।

  1. मैं रोज़ सुबह जल्दी उठकर पार्क में घूमने जाऊंगा।
  2. मैं तली हुई और बाज़ार की चीज़ें खानी छोड़ दूंगा।
  3. मैं हर चीज़ समय पर करूँगा।
  4. मैं योग सीखूंगा और प्राणायाम भी करूंगा।
वगेरह, वगेरह वगेरह।

मैं यह करूंगा वो  करूंगा। पर अंत में सब फुस्स। किसी भी रेसोलुशन की उम्र दो पल से जादा नहीं होती।

तो जनाब ऐसे में आप वाकई में पतले नहीं हो सकते।

बिलकुल नहीं!

कभी नहीं!



Sunday, September 02, 2012

बुलबुले


चलो ज़िन्दगी के इस बुलबुले को
कुछ और फुलाएं,
एक मुस्कान तुम फूंको और एक मैं.
सरकती हुई बैलगाड़ी को
धडधडाती रेल के पहिये लगाएं.
इस फीकी दाल में,
कुछ चटपटा छोंक लगाएं.
आओ ज़िन्दगी के बुलबुले को,
कुछ और फुलाएं.

रुकी हुई घडी की
चाबी फिर घुमाएँ,
सूखी हुई झाड़ियों के बदले,
तारो ताज़ा वृक्ष फिर उगाएं.
ठहरे हुए पानी में,
किसी तरह फिर उबाल लाएं.
ज़िन्दगी के बुलबुलों को,
चलो कुछ और फुलाएं .

बुरी खबरों को भुला के,
कुछ बढ़िया लतीफे सुनाएं.
किस्मत के कटोरे को,
खुशियों से लबालब भराएँ.
अपने मन के अंधेरों में,
उम्मीद के जुगनू फिर जगमगाएं.
समय की पेटी से,
कुछ दिलचस्प पल फिर चुराएँ. 

ज़िन्दगी के बुलबुलों को,
चलो कुछ और फुलाएं .